सिपाहियों का बंदूक ताने पहरा सज्ज हो गया और उस पंक्ति को लेकर आगे बढ़ गया। स्टेशन तक वे पैदल चले पंरतु मुझे उसमें सम्मिलित नहीं किया गया। भला ऐसा क्यों? मुझे चिंता होने लगी। इतने में एक मोटर आ गई। दो हट्टे-कट्टे गोरे अधिकारी बाहर निकले। मै। भीतर बैठ गया, फिर वे बै गए और मोटर बंद हो गई। न जाने कैसे पंरतु शहर और स्टेशन पर यह बात फैल गई थी कि मैं आज ही कालापानी प्रस्थान कर रहा हूं। जिस मार्ग से बंदी जाते हैं, उस मार्ग पर मेरा भी दर्शन होगा, इसी आस में लोग हर प्रकार से प्रयास करके छिप-छिपकर टापते जमे हुए थे, अतः मुझे गुपचुप अन्य मार्ग से ले जाना आवश्यक था। यह एक कारण था और दूसरी बात यह कि मंै मार्सेलिस से भागा हुआ और वे गुप्त षड्यंत्र के दिन! न जाने कौन कहां कैसा षड्यंत्र रचकर मेरी मुक्ति का प्रयास करे-क्या कह सकते हैं। सहज डग भरते उन दिनों सुरंग उड़ती थी। ऐसी स्थिति में मार्संेलिस
लालटेन जल रही थी। उसके प्रकाश में थोड़ा सा दिख रहा था। उसी उजाले में मैंने अत्यंत ममता से उस पत्र को पढ़ लिया। उसमें दुःख तथा तेजोभंग का एक शब्द भी नहीं था। इसके विपरीत एक धैर्यशाली संदेश भेजा गया था कि अंगीकृत व्रत की पूर्ति के लिए इससे भी अधिक कठोर तपस्या क्यों न करनी पडे़, चिंता नहीं। मैंने ठान लिया कि इस पत्र का उत्तर भेजूं। अंदमान में एक वर्ष में एक पत्र भेजने की अनुमति दी जाती है, परंतु मैंने सुना था कभी कभी ऐसी सहूलियत भी नहीं मिलती। अतः हो