की नींद सोते होंगे। मैंने उसी अधिकारी से श्री वामनराव जोशी1 , सोमण2 आदि सह अभियुक्तों की ठाणे की जानकारी चाही।

चले भैया कालापानी

दो-चार दिन में अंदमान प्रस्थान करने के लिए सभी बंदियों की उस सेना को बाहर निकाला गया। अन्य बंदियों के साथ मैं भी कोठरी के पास तैयार होकर खड़ा रहा। पैरों में बेड़ियां, अंदमान के लिए एक अंगोछा, एक चद्दर और एक बंडी- इस तरह का वेश, बगल में जैसे-तैसे दबाया हुआ टाट और कंबल का बिस्तर, जिसे उस टाट के खुदरेपन तथा कठोरता के कारण लपेटना कठिन हो रहा था और एक हाथ में टीन के ‘थाली पाट’। पुनः वह टोली एक पंक्ति में तालबद्व बेड़ियां झनझनाती हुई चली। जो कोई भी दिखे, उसे ‘राम-राम, चले भैया कालापानी’ कहते हुए राम-राम का आदान-प्रदान करती हुई वह टोली चल रही थी।

जेल के द्वार पर आते ही वह टोली बाहर निकली।


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लिजिए।’’ कहते हुए उसने एक पाटी मेरे हाथ में दी और हिदायत दी कि सुपरिटेंडेंट साहब ने सभी वाॅर्डरों को यह आज्ञा दी है कि आपको आपके भाई का समाचार यदि किसी ने दिया तो उसे दस वर्ष का कालेपानी का दंड दिए बिना नहीं छोड़ा जाएगा। आपने अपने मुख से एक शब्द भी निकाला तो मैं मर जाऊंगा। इतना गिड़गिड़ाता हुआ वह पीछे घूम गया और दूर जाते ही जोर-जोर से जूते चरमराता तथा तालबद्व डग भरता हुआ पहरा देने लगा। वह पाटी मेरे छोटे भाई बाल का पत्र था। दूर कहीं


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