वह देह मुझे दिखाई देने लगी, जो यातनाएं से व्याकुल प्राण होने पर उन कष्टों के शारीरिक तथा मानसिक आघात सहती हुई खड़ी थी, जैसे एक बार बहका हुआ हठी गजराज अपने गंडस्थल पर तीक्ष्ण-से-तीक्ष्ण आघातों को ‘उफ’ तक न करते हुए सहता है और अडिऋयल बना अचल खड़ा रहता है। इस कोठरी में वह वीर पुरूष सलाखों के पास उसी तरह हाथ मलता हुआ खड़ा रहा होगा जैसे पक्षीराज गरूड़ पिंजरे के पास झुंझलाता, झल्लाता हुआ रहता है। मेरी चिंता तो नहीं करते होंगे? या मन में यह तो नहीं कहते होंगे- क्या हुआ मैं चला गया तो? वह तो पीछे है न? फिर चिंता काहे की? वह देख लेगा। यदि यह कहते होंगे तो अब मुझे भी इसी आहत होते देखकर उन्हें कैसा प्रतीत होगा? उन्हें कितना आघात पहुंचेगा? इससे अच्छा है, यदि उनसे मेरी प्रत्यक्ष भेंट न हो और मुझे भिन्न-भिन्न वार्डों में रखा जाए।
मेरे विचार
सभी को विश्वास था कि हेग में मैं छूट जाऊंगा और पुनः फ्रांस भेज दिया जाऊंगा। इसी आनंद में मेरे ये साथी अपने दुःख भूले हुए थे। परंतु अब उनका अंतिम आशा-तंतु टूट जाएगा। मैं सचमुच ही कालापानी जाऊंगा और यह समाचार मैं स्वयं उन्हें दूंगा। एक बड़े भाई तो पहले ही आजन्म कारावास पर कालापानी चले गए थे। आज मेरा भी चिरवियोग होगा। आज हमारा यह बालक सचमुच अनाथ हो जाएगा। जब उसके मन में यह दारूण सत्य उतरेगा कि मैं लगभग फिर कभी न दिखने के लिए ही अंदमान