को नींद नहीं आ रही है, अतः तुम भी अब सो जाओ।’’ यह कहते ही उन बंदियों में से प्रायः सभी बंदियों ने चीखना-चिल्लाना बंद किया और फिर लगभग बारह बजे रात मेरी आंख लग गई।

प्रातः का स्मरण हो आया कि मेरे ज्येष्ठ बंधु बाबाराव जब आजन्म कारावास’¹ पर गए, तब वे इसी तरह के किसी चालान के साथ गए होंगे और उससे पहले यहीं-कहीं उन्हें बंद रखा गया होगा। अतः वाॅर्डर से पूछा, पर वह नया था, कुछ नहीं जानता था। एक पुराने सिपाही ने थोड़ी सी खोजबीन करते हुए कहा,‘‘उन्हें इसी कोठरी में बंद किया गया था, जहां आज मुझे रखा गया है।’’ वह सिपाही चला गया। मेरी आंखों के सामने मेरे ज्येष्ठ बंधु की मूर्ति खड़ी हो गई । उनके अभियोग के समय मेरे साथ जो लोगा थे, उनसे मुझे ज्ञात हो गया था कि जेल में उन्हें कड़ी यंत्रनाएं सहनी पड़ी। मुझे उनकी यंत्रनाएं भी दिखाई देने लगी। उनकी


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तथा अंगीकृत व्रत से वह लेशमात्र विचलित नहीं हुआ। वह मेरा अनुज। माता-पिता की छत्रच्छाया बाल्यावस्था में ही उठ जाने के कारण मैं ही उसका माता-पिता बन गया था। कल-परसों तक पल भर मुझसे दूर होने पर जो रोने लगता, वही मेरा छोटा भाई यहीं पर है, मेरी तरह ही बेड़ियों में जकड़ा हुआ तथा चक्की पीसने जैसा कठोर कार्य कर रहा है। मानो उसके ये सारे कष्ट कम थे, इसलिए उसे आज मेरे आजन्म कारावास का समाचार दिया जाएगा! मेरे आजन्म कारावास का उन्हें पता था, तथापि लगभग


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