से धृणा कर पीछे हटने की बजाय मनोविकारों के विस्फोट से आग लगा। मिट्टी के तेल का कनस्तर जैसे एकदम लपेटों में घिर जाए- उसके उजाले में वह तमाशा देखता रहा और देखते-देखते ही उस कारण तथा स्वरूप का तात्तिवक पृथक्करण भी करता रहा। भले ही व्यक्तिगत दुःख से मन व्याकुल हो, तथापि उस गड़बड़झाले में मन अपना
दुःख-दर्द भूलकर घड़ी भर के लिए वह तमाशा देखे बिना अन्य कुछ कर भी नहीं सकता, इतना उन लोगों के ठहाकों का शोर हो रहा था। मंैने उसमें प्रत्यक्ष हिस्सा नहीं लिया तथा चालान ने यह कहते हुए उसकी अपेक्षा की कि ‘बालिस्टर साहब को तंग मत करो।’ इतना ही नहीं,ग्यारह बजे रात को जब उनका हंगामा शिखर पर पहुंच गया तब सिपाहियों ने उनसे कहा,‘‘साब को नींद नहीं आ रही है, अतः तुम भी अब सो जाओ।’’ यह कहते ही उन सिपाहियों ने उनसे कहा, ‘‘बालिस्टर साब
वह लड़का, जिसे अहमदाबाद2 में लाॅर्ड मिंटो पर बम फेंकने के आरोप में अठारह वर्ष की आयु में ही जेल में बंद होकर साहस के साथ उन यंत्रणाओं का सामना करने का अवसर मिला था। अहमदाबाद से उसे छोड़ा गया तो घर आकर बिस्तर पर जरा पीठ ही टिकाई थी कि राज्यक्रांति तथा राजनीतिक हत्या के गंभीर आरोपों में उसे पुनः पकड़कर कारागार में डाल दिया गया। लेकिन वर्ष भर एक के बाद एक यातनाओं, धमकियों तथा निर्दयता के आघात सहते हुए उस कोमल आयु में भी अपने कठोर निश्चय