उस रात मेरी भी अवस्था कुछ ऐसी ही हो जाती, परंतु सौभाग्यवश ‘बैरिस्टर’ और ‘बड़ा साहब’ के रूप में जिसे-तिस के मुंह में अपना बोलबाला था। बंदियों में और उनमें भी घुटे हुए बदमाश अपराधियों में, यदि किसी वर्ग के विषय में सहज आदरभाव तथा भय उत्पन्न होता है, तो वह ‘बैरिस्टर’ वर्ग के विषय में है। कवि, विद्वान, सात्तिवक जनों के संबंध में उनकी कोई विशेष भावना नहीं होती, भले ही वह अंगे्रजों का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। परंतु ‘बैरिस्टर’ कहते ही आदरमिश्रित आश्चर्य भाव से भृकुटियां तानकर उनके मुख से भी ‘अच्छा!’ निकल ही जाता है। इसका कारण भ्ज्ञी स्पष्ट है। चोरी, उचक्की, डाकेजनी, न्यायलय तथा कारागृह में उनका सारा जन्म व्यतीत होता है। उधर उनके मतानुसार सहज ही ‘बालिस्टर’ कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम् समर्थ एक अद्वितीय प्राणी प्रतीत होगा ही, क्यांेकि वह उनके अत्यंत कुशलतापूर्वक बुने


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गया। अंधेरा छाने लगा। इतने में कहीं से ऐसे मनुष्य की आवाज आई जिसे स्वयं सुनकर लोग भयभीत हो जाएं। धीरे से देखा, दुष्टों में दुष्ट जो वाॅर्डर मेरे लिए नियुक्त किए गए थे, उनमें से एक बंदी वाॅर्डर मुझे हौले से संकेत कर द्वार के निकट बुला रहा है। मैं चला आया। इधर-उधर देखकर उस बंदी वाॅर्डर ने कहा, ‘‘महाराज, आपकी वीरता की ख्याति हमने सुनी है। ऐसे शूर पुरूष के चरणों का मैं दास हूं। आपके लिए मुझसे जो भी बन पड़े, वह सब करूंगा। अब मैं एक समाचार देता


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