’’ठीक है, मैं कभी हेग के भरोसे रहा ही नहीं था। परंतु क्या मुझे हेग का निर्णय देखने को मिलेगा?’’
’’यह मेरे वश में नहीं है। आपके लिए जो संभव है, वह मैं करूंगा। फिर भी हम अजनबियों को भी विह्नल करनेवाला समाचार आपने जिस धीरज से सुना, वह मेरी सहायता पर निर्भर रहेगा, ऐसा नहीं लगता।’’ वे सज्जन छअपटाते हुए बोले। ’’ ऐसा थोड़े ही है कि यह इस तरह के समाचार मुझे भयंकर नहीं लगते, परंतु पहले से ही समझ-बुझकर इस संकट का सामना करने के संकल्प से भरे होने के कारण हमारा मन कठोर हो गया है। यदि आप भी मेरी स्थिति में होते तो इसी विवेक के बल पर ऐसा ही धीरज रख पाते। आपकी सहायता के प्रति मैं आभारी हूं।’’
इतने में ही किसी के आने की आहट हुई। वह सज्जन झट से मेरी कोठरी के आगे से निकल दूसरी दिशा की ओर अपने काम से चलते
वर्ष अथवा छह महीनों के लिए जो कारागृह में बंद थे, ऐसे लोगों ने भी उनके अनुभवों तथा उनकी यातनाओं की कहानी को समयःसमय
पर प्रसिद्व किया और हमने उसे पढ़ लिया। परंतु ऐसे आत्म-स्मृति कथन में आत्म-श्लाघा की जो गंध अनिवार्य रूप में आ जाती है, वह हमारे मन को पुनः-पुनः सकुचाया करती थी और प्रियजनों के पास अपने सुख-दुःखों को खुले मन से कह से कह डालने की प्रवृत्तिा गत तथा जिस संकटों के पराभव की कहानी बतलाने का आनंद अनुभव करने के लिए अत्यंत उत्सुक होने पर भी परिस्थिति पुनः-पुनः मार्ग अवरूद्व कर देती थी।