इस नामचीन संस्था का संचालन हमारे हाथ में आने के कारण हमारा कर्तव्य है कि हम वह परंपरा निभाएं। चीखो, चिल्लाओं, नाचो गालियां दो। चालान का नाम रोशन करना चाहिए न भाई!’
और बंदियों में जो उस बीभत्स विनोद तथा निर्लज्ज व्यवहार का नंगा नृत्य कर रहे थे, वे कुछ अंशों में कर्तव्य भावना से उत्तोजित होकर ही ऐसा कर रहे थे। बीच में ही कोई निर्लज्ज शिरोमणि चीखता, ‘चालान का नाम राखियो, भाई! और फिर सीटियां तालियां, बेड़ियों की झनझनाहट की धमा-चैकड़ी शुरू। पूर्वापर चले आए इस चालान का ‘एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिद्रिंयारामो मोघं पार्थ स जीवति।।’ इस तरह उदात्त बुद्वि से वे सारे लोग दस-बारह बजे तक उस नीच कर्तव्य को निभाने का प्रयास करते रहे। चालान के इस संस्थागत अभिमान के सामने क्या सिपाही, क्या सुपरिटेंडेंट सभी अपना सारा बड़प्पन ताक पर रखकर गुपचुप तमाकू
को सौंपा गया, जैसे कोई निर्जीव वस्तु हों। मोटर-रेल, पुन्ः स्टेशन । यह पता चला- यह ठाणे है और हमें वही के कारागृह में जाना है।
प्रकरण -3
ठाणे कारागृह
कारागृह में जहां-तहां गड़बड़। पचास वर्ष का दंड का, कालेपानी का एक बैरिस्टर बंदी! अधिकारियों का कड़ा आदेश कि कोई मेरी ओर आंख उठाकर भी न देखे। सारे वाॅर्डर और कैदियों को बाहर निकालकर एक भाग पूरा खाली करके रखा था। परंत उस कठोर आदेश के बावजूद बंदीगृह की जिज्ञासा बदाते हनंी बनी । उस कोठरी