के सभासद का उच्च स्ािान हमें सहजता से नहीं मिला था। पुलिस चैकी, मजिस्ट्रेट, कोर्ट, सेशन, ज्यूरी, हाईकोर्ट आदि कई परीक्षाओं में खरा उतरा अथवा चढ़ा मनुष्य ही आजन्म कारावास, कालेपानी की प्रतिष्ठा प्राप्त कर पाता है। तिसपर भी चुन-चुनकर जो विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि रूपी बदमाश यहां आए थे, उन बदमाशों की यह प्रमुख संस्था थी। उसका पूर्वापर लौकिक रूप ऐसा था कि थाने में चालान का आगमन होते ही सिपाही, हवलदार, जेलर, सुपरिटेंडेंट सभी चिंतामग्न होने चाहिए, दीवारें टूटनी चाहिए, सीखचें उखड़ने चाहिए, सिर फूटने चाहिए, दो-एक सिपाहियों को उनकी ‘हां जी, हां ज’ करते हुए जैसे-तैसे अपनी जान बचानी चाहिए- तभी उसे चालान कहा जाएगा-तभी उसका नाम सार्थक होगा। अन्यथा, बदमाशों के वे आचार्य, कुलगुरू नूतन सदस्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहते,‘फिर बदमाशी क्यों? यही चालान की पूर्व परंपरा है। आज


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क्यों? अर्थात् कुछ-न-कुछ नया घटनेवाला है। मैंने पहरे पर खडे़ गोरे अधिकारी की ओर जिज्ञासा दृष्टि से देखा। उसने अपनी टोपी पीछे करने के बहाने अपने हाथ दूर तक पीछे ले जाकर देा बार हिलाए- अर्थात् हमें कहीं और पहुंचना है। भोजन हो गया। भित्तिा पर एक नुकीले कंकर से कुछ कविताएं घसीटकर लिखी थी- उन्हें जल्दी-जल्दी पढ़कर रगड़-रगड़कर साफ किया- जिससे किसी को उनका पता न चले। इतने में सिपाही ने ‘चलो’ कहते हुए द्वार खोला। गोरे साजेंट के अधीन हमें कारागार अधीक्षक


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