करना अपना परम कर्तव्य है। मन को जब तक यह समझ में नहंीं आता कि अधमता भी अपना एक कर्तव्य है-अधम व्यक्ति सरेआम अधमता नहीं कर सकता। उन बंदियों में अभी भी पानी शेष है और इसलिए इस नंगे नृत्य में बेधड़क हिस्सा लेने का निलर््ाज्ज साहस अभी तक नहीं कर सके थे, चिल्ला-चिल्लाकर कहते, ‘ऐ भाई, गाओ। ऐ साला, चिल्ला न! अरे अपने चालान के नाम का डंका बजना चाहिए न! पिछली बार जब हम यहां आए तब दरवाजों के सीखचों को पकड़-पकड़कर उन्हें जोर-जोर से हिलाते और बरतन दीवार पर मारते रहे, सिपाही गिड़गिड़ाकर पैर पकड़ने
लगे और उन्होंने हरेक को चुपचाप तमाकू थमाा दी। भई, गला फाड़-फाड़कर चिल्लाओं चालान का नाम मत डुबोना।’
चालान का नाम
क्यांेकि चालान काराजगत् की एक महनीय संस्था ही बन गई थी, इसलिए उसका नाम कोई साधारण बात नहीं थी। उस चालान
एक समाधान की बात यह है कि सरकार ने हिंदुओं के पुनर्जन्म के सिद्वांत को स्वीकार कर लिया है और ईसाई धर्म के पुनरूत्ािान का सिद्वांत छोड़ दिया है।’’
यह क्या? आज इतना शीध्र भोजन? कारागृह में भले ही जान चली जाए, परंतु पूर्व नियोजित कार्यøमानुसार ही चलना होता है। यहां पर सबके लिए इतना समयशील रहना होता है। भोजन के लिए, अन्न के लिए, मृत्यु आ जाए तो भी भोजन जल्दी नहीं आ सकता, यदि आवश्यक हो तो मृन्यु भोजन आने तक रूके। तो फिर भला आज यह असमय भोजन