दारू की बोतलें गटकते हुए वे नशे मंे झूम-झूमकर चल रहे थे। कोई सिंध का, कोई धारवाड़ का, कोई कोंकण का, कोई गुजरात का निवासी। उनकी विभिन्न भाषाएं भले ही उनके मनोविचार तथा मनोविकार को पूरी तरह अभिव्यक्त करने मंे रहने का अवसर पाकर सामाजिक आनंद में क्षण भर को मग्न हो गया था। सांझ की वेला अर्थात् इस विद्रोह हेतू उठी बीभत्स भावनाओं तथा विनोद के नंगे नाच की वेला। हर कोठरी से चीखने-चिल्लाने, गाली-गलौज, ठहाकों, अनुच्चारणीय शब्दों का जी भरकर उच्चार आदि बातों की रेलपेल होती और उसमें भी थोड़ी सी कर्तव्यनिष्ठा की गंध आती। मनुष्य स्वभाव कितना विचित्र है! ये अधम-से-अधम व्यक्ति यही समझते कि इस तरह बीभत्स हुल्लड़बाजी करना अपना परम कर्तव्य है। मन को जब तक यह समझ में नहंीं आता कि अधमता भी अपना एक कर्तव्य है-अधम व्यक्ति यही समझते कि इस तरह बीभत्स हुल्लड़बाजी


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वह क्रमानुसार भोगना पडे़गा। यही निर्णय उचित है, अतः आपका दंड पचास वर्ष तथा मुक्ति का वर्ष 1960¹ ही रहेगा। ‘यह बताने के लिए जो एक अंगे्रज सज्जन आए थे, उन्होंने मेरे आवेदन-पत्र की परिभाषा का हेतुपूर्वक अवलंब करते हुए मुझसे विनोदमिश्रित स्वर में कहा,‘‘सावरकर साहब, आखिर सरकार ने यही निश्चित किया कि आपको इस जन्म की आजन्म कारावास की सजा काटने के बाद


अगले जन्म में भी आजन्म कारावास काटना होगा।’’ मैं भी हंसते हुए बोला, ‘‘तो फिर इसमें भी कम-से-कम


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