बनना है!) इस तरह के क्रीड़ालयों में उन्मुक्त हास्य-हुल्लड़ सभ्यता सभी नियमित बंधनों को पैरों तले कुचलकर दिन-रात उच्छृंखल तांडव करती रहती । वह हास्य जानता था कि आज जो उसका नाम इस तांडव पटल पर है, वही उसका कल मृत्यु के सरकारी पटल पर दर्ज किया जाएगा। तात्कालिक दुःख का हास्य सभी हास्यों में विकट होता है।

उन सभी वस्तुओं से, जो जीवन को रमणीयता प्रदान करती हैं, वंचित होकर भी उस कारावास में, जहां हुए पशु भी थर-थर कांपते हैं, बेड़ियों में जकड़े, पाप करते-करते बेशर्म हो गए, पाप से पूरा परिचय न होने के कारण जी तोड़-तोड़कर खानेवाले, क्रोध में लाल-पीला होकर कुढ़ते रहने वाले और दुःख से हिचकियां भर-भरकर रोनेवाले सैकड़ों जीव कराहते हुए ही सही, जोर-जोर से ठहाके लगा रहे थे। तीव्र संकट के मनोरंजनार्थ साधारण विनोद पर्याप्त न होने से बीभत्स विनोद रूपी


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दंड भुगतने के लिए दूसरा जन्म लेना चाहिए- यह हास्यास्पद होगा और वास्तव में यह पचास वर्ष कालेपानी की भीषण पद्वति से मरने का अर्थ है- यह जन्म खत्म करके दूसरे जन्म में भी दंड भोगना है। तो यह हास्यास्पद अर्थ टालने के लिए भी मेरी मुक्ति का वर्ष 1960 न रखते हुए आजन्म कारावास अर्थात् पच्चीस वर्ष- जो अधिक-से-अधिक दंड समझा जाता है- ही निश्चित किया जाए। इस आवेदन-पत्र का आज उत्तर आ गया । यह निर्णय दिया गया था कि ‘आपका आजन्म कारावास एककालिक न करते हुए


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