बाद एक लगी हुई कोठरियों में अंदमान जा रहे सारे बंदियों के भरे होने और भोजन करते-घुमते उनके भाषण, उसांसें, रोना और हंसना यह सब युनने और देखने से बहुत दिन के मेरे मन को उस दुःख में भी कुछ आनंद आए बिना न रहा। मैंने उन बंदियों का ‘हंसना’ जो कहा, वह सच है। दुःख और यातनाओं की भयपद्र सुरंग के दुःख की अति में हंसना ही हर तरह की हंसी में विकट होता है। दुःख का भार असहनीय होने अथवा निर्लज्जता के कंधे से उसे हलके से फेंक देने से दुःख भी खिलखिलाने लगता है। शोक भी उसी तरह हंसता है, जिस तरह हर्ष का अतिरेक होने पर वह रोता है। कहा जाता है कि फ्रांस की राज्यक्रांति के दौरान अमानष रक्तरंजन वध, हत्याओं, फांसी और मारकाट की पेरिस में अति हो गई थी, और ऐसी भीषण स्थिति हो गई थी कि आज प्रधानमंत्री बने और कल फांसी। उस समय जो नाट्यगृह कभी


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सामने हो रहे कठोर-से कठोर आघातों को झेलने के लिए क्या मैं छाती तानकर आगे नहीं खड़ा रहा? तो फिर अब जो अटल, अपरिहार्य है, जो सबका कार्य भाग है, उसके भागी भी सभी होंगे। और जो भोगना पड़ा वह तो कुछ भी नहीं है, अभी तो ं ं ं ं।

मैंने पहले भी एक निवेदन किया था, जिसमें यह प्रार्थना की थी कि मुझे दिए गए दो आजीवन कारावासों का दंड एककालिक किया जाए। उस प्रार्थना के समर्थनार्थ जो कारण मैंने प्रस्तुत किए थे, उनमें से एक यह था कि दंडविज्ञान में आजीवन कारावास


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