की बात नहीं होगी। आप व्यर्थ कष्ट न करंे।’’ उस दिन पंचों के सामने मेरी परीक्षा हो गई। वह परोपकारी अधिकारी भी वहां पर उपस्थित थे ही। मुझे ज्वर था, परंतु रीति के अनुसार मेरा वनज लेकर मुझे कालेपानी भेजने की पात्रता निश्चित की गई। बगल में बोरिया-बिस्तर, हाथ में बरतन-बेंड़िया झनझनाते हुए मेरा भी जुलूस निकाला गया। मैं भी उस परकोटे के द्वार के भीतर घुस गया। उस द्वार की देहरी पर कालेपानी के सिंहद्वार की देहरी थी। मैंने उसे पार किया, हिंदुस्थान से नाता टूट गया। अंदमान के लिए मेा प्रस्थान हुआ।
प्रकरण-4
अंदमान के लिए प्रस्थान
ठाणे के कारागृह में केवल अंदमान काा चालान बंद करने के लिए ही जो स्वतंत्र परकोटे का भाग था, उसमें अर्थात् अंदमान के उस द्वार के अंदर पांव रखते ही जिस कोठरी में मुझे बंद किया गया था, वह कोठरी यद्यपि अकेली थी तथापि उससे एक के
होंगे? उस पर भी मुझे उनकी वृद्व ममतामयी माताओं पर, जिन्होंने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया और उनसे उनकी अंधे की
लाठी नियति ने अचानक छीन ली- दया आती। और वे वज्रनिश्चयी वीर- जिन्होंने मात्र सुनने के लिए भी दुस्सह यातनाएं झेलीं- पर ‘उफ’ तक नहीं किया, न ही मेरे विरूद्व एक शब्द कहा, और उन युवकों की सब यातनाओं का स्मरण होते ही मुझे इतना दुःख हुआ कि कुछ देर में मैं अपनी यातनाओं को ही भूल गया। पुनः सोचता, कहीं मैं पिछड़ तो नहीं गया? सबसे आगे रहकर