पहुंचकर काम का बहाना करने लगा। सब भोले बने हुए थे। सिपाही भी किसी के जरा सी ‘चूं’ करते ही बरस पड़ते, ‘ऐ क्या बात है, कायदे से चलो,‘ मानो इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि एक क्षण पहले इधर कैसा घपला मचा था। अब तक बंदियों से अधिक सिपाहियों का जो भीड़-भड़क्का तथा ठेला- ठेली चल रही थी, वह सब जैसे ‘कायदे’ से या विधिवत् चल रही थी।

परोपकारी अधिकारी

दूसरे दिन यह निश्चित हुआ कि कालेपानी भेजने के लिए हमारा स्वास्थ्य, आयु आदि अनुकूल है या नहीं, इसकी वैद्यकीय जांच हो जाए। एक परोपकारी अधिकारी ने मुझसे कहा, ‘‘ यदि आप कालेपानी पर नहीं जाना चाहते तो मुझसे जितना भी बन पड़ा, आपको यहीं रखने का अवश्य प्रयास करूंगा।’’ मैंने कहा,‘‘ आपकी सद्भावना के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं। परंतु मुझे हिंदुस्थान में रखना कदाचित् बंबई के गर्वनर के भी वश


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जा सकता है और उनका, जिन्हें कोठरी के इस बंदीगृह की सुरंग में ही सारी सजा काटनी है? उनमें से कोई मेरे बाल मित्र थे, कोई विश्वस्त सहयोगी थी तो कोई अभिन्नह्नदय सहचारी थे- प्रायः सभी मुझपर असीम श्रद्वा रखते थे, मुझसे निस्स्वार्थ प्रेम करते आए थे। उन पर तथा उनके परिवारों पर आ पड़े संकट में मैं उन्हें नहीं बचा सका, न ही उनकी किसी तरह सहायता कर सका। इस भ्रान्ति से कि मेरे कारण ही उन्हें इतनी सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा ह, क्या वे मुझसे रूष्ट नहीं हुए


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