बहन की हत्या
देखो, वह लड़का, अभी मूंछें भी नहीं भीगी, अठारह-उन्नीस की आयु! भंगेड़ियां की संगत में एक दिन भंग के नशे में अपनी बहन को इसलिए चाकू घोंप दिया कि उसने गाली दी। वह तो उसी समय ढेर हो गई और यह अब डरते, सहमते बिछौने के बोझ तले झुकती कमर के साथ तथा बेड़ियां उठाए न उठने के कारण लंगड़ाते-लंगड़ाते, घिसटता चल रहा है। इस भय से सहमा हुआ है कि एक बार कालेपानी गया तो अपना गांव और स्वजन फिर कब दिखेंगे। देखिए, इन दो सिरों के बीच में उग्रता, लज्जा,
निर्लज्जता तथा क्रूरता की विविध प्रतियां क्रमशः लगाई गई थी, जो इस घिनौने भोंडे जुलूस में बेड़िया खनकाती हुई जा रही थी।
बात-की-बात में वह जुलूस परकोटे के भीतर घुस गया। उनके निरीक्षणार्थ काराधिकारी चल पड़ा। यह समाचार मिलते ही प्रत्येक बंदी सिर पर पांव रखे दौड़ा और यथास्थान
और जिसे थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना आता है, उस कैदी को सौ-सौ लोगों की देखरेख और अन्य महत्तवपूर्ण कृषि कार्य सौंपे जाते है। यदि ऐसा हो तो कारागृह की इस कोठरी के जीवन से उधर का जीवन अत्यधिक सुसह्म होने की संभावना है। कम-से-कम सागर तट पर पल भर रूककर खुली हवा में सांस लेना तो संभव होगा- लोगों में घुल-मिल जाने का सुअवसर प्राप्त होगा, उसके योग से पुनः प्रचार और लोकोपयुक्त कार्य भी करना संभव होगा। दस वर्षों के पश्चात् अपने परिवार के साथ घर भी बसाया