नवागत बंदियों को चकित कर दिया। उनमें से जो कुछ कम आयु के थे और जिनकी छाती में अभी तक ह्नदय नामक कोई चीज धड़क रही थी और कालेपानी जैसे दंड से लज्जित थे, इसी तरह कुछ अन्य बंदी, जिन्हें इस बात की चिंता थी कि आगे कैसी कटेगी, उनको यही आशा थी कि आगे चलकर कहीं यह सचमुच जमादार बना तो हमें सहारा देगा- अतः बेचारे अभी से उसकी सेवा-चाकरी में लगे रहते, उसकी ‘हां जी, हां जी’ करते। रास्ते से बंदियों की यह टोली आते ही स्टेशन पर कोई केले, नारियल, खाद्य वस्तुएं, पैसे आदि दान करते। उसमें से पैसे-वैसे मिलने पर ये बंदी अपने इस ‘जमादार’ को दे देते और चुपके से उसके पैर रगड़ते। वह भी उन लोगों को डिगीन साहब या फिर मांटफर्ड साहब से कहकर आज ही मुकादमी का काम दिलवाऊंगा आदि, जो जी में आए सो नाम लेकर गप्पें हांकता, और अपनी भोगेच्छार्थ उनके भोलेपन की बलि चढ़ाता।
और धार्मिक दृष्टि से अध्ययन करते समय ज्यू लोगों के राष्ट्रीय कारावास की दुर्भाग्यपूण तथा असहाय अवस्था और उससे छुटकारा पाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयत्नों का वर्णन पढ़ रहा था ं ं ं परंतु ये लोग मुझे अंदमान क्यों नहीं भेजते? मैंने कुछ ऐसा सुना था कि दंड घोषित होने के पश्चात् यदि बंदी को कालेपानी नहीं भेजा गया तो दंड के वे छह महीने गिने नहीं जाते। इसके अतिरिक्त मैंने अंदमान रेग्यूलेटर में भी पढ़़ा था कि छह महीने कारावास भुगतने के बाद बंदी को बाहर द्वीप पर छोड़़ा जाता है