चालान आ गया
तीन बज रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति अपने निकटवर्ती बंदी से आतुरता से पूछता, ‘‘अरे, अभी तक’ ‘चालान’ क्यों नहीं आया?’’ इतने में कारागार के द्वार से बंदियों में से कुछ लोग अचानक इधर-उधर मुड़ते हुए दिखाई देने लगे। ‘चालान’ आ गया’, ‘कहां आ गया?’, ‘हां-हां, ठेठ द्वार पर है।’, ‘कितने हैं?’, ‘कैसे हैं? आादि प्रश्नों तथा उत्तरों की झड़ी लग गई और बंदियों में ही नहीं अपितु सिपाहियों में भी भगदड़ मच गई, क्योंकि वे भी अवश्य ही उतने ऊब चुके होंगे जितने कि ये बंदी। इतने में ‘झन्-झन्’ की गहरी लयबद्व झंकार निकट आने लगी। प्रत्येक बंदीवान अकेला या झुंड बनाकर उस मार्ग के आस-पास पल भर के लिए अनुशासन को ताक पर रखते हुए छिपकर बैठ रहा है। आ गया, चालाान आ गया। कोई अत्यंत उग्र, कोई चट्टान सदृश कठोर, कोई भयंकर खूंखार, कोई बलवान,
शांति ‘सप्तर्षि’ कविता¹ के उत्तरार्ध का विषय बन गई है। आज दो आवेदन-पत्र दिए थे। डोंगरी छोड़ते ही उधर जो थोड़ा सा दूध मिलता था वह भी बंद हो जाने से तथा भायखला में केवल ज्वार की रोटी खाने से पेट खराब हो जाता था, अतः यह मांग की थी कि पुनः दूध दिया जाए। मुझसे अपने घर की तथा सरकार की सारी-की-सारी पुस्तकंे छीन ली गई थी। मेरी दूसरी मांग यह थी कि उनमें से कोई एक पुस्तक पढ़ने के लिए मिले। इस आवेदन-पत्र का उत्तर मिल गया-दूध की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती, बाइबिल के विषय में सोचें।