बंदीशाला में इस मेले के आने का दिवस बहुतों को एक उत्सव का दिन प्रतीत होता है; क्यांेकि प्रत्येक बंदी के प्राण इस उकताहट भरे, नीरस जीवन के पंेच से, किसी भी बहाने से क्यों न हो, मुक्ति पाने के लिए घुल-घुलकर कांटा बनते हैं। चाहे किसी कौए का उड़ते-उड़ते एकाध पर गिर पड़े या एक चिड़िया को दूसरी चिड़िया मारने लगे- कोई भी नई, साधारण सी घटना एस उकताहट भरे जीवन में तनिक मनोंरजन का कारण बनती है, उसमें रंग भरती है और फिर आज तो ‘चालान’ के लिए पूर्ववर्ती परकोटे की एक भीत की ओट में स्वतंत्र कोठरियों का एक रिक्त हिस्सा आरक्षित था। एस दालान को झाड़-बुहारकर साफ करने में, राशन-पानी के नाप-तौल का प्रबंध करने में, कपड़ों की गिनती में तथा अन्य ढेर सारे प्रबंधों की उतावली में आधे से अधिक बंदी व्यस्त थे और शेष आधे बंदी उनकी उस धांधली तथा त्वरित निरीक्षण में अपनी उतावली में व्यस्त थे।
ऐसा कुछ नहीं था जो देखने योग्य हो। चहलकदमी करने लगा। मन-ही-मन सोचने लगा, मेरे पकड़े जाने से हमारी क्रांतिकारी संस्था की क्या स्थिति होगी? अब आगे की योजना बनानी चाहिए।
सांयकालीन भोजन आ गया। मेरे मन में राजनीति के विचारों से जो खलबली मची थी- अन्य विषय मिलने से वह कुछ शांत हो गई। भोजन से निपटकर, बरतन मांजकर पुनः उस हाल ही में बंद हुए सलाखोंवाले द्वार के निकट खड़ा रहा। सांझ हो गई। वही संध्या, वही रात, वही तात्तिवक विचारों से मिली हुई तात्कालिक