में फंसाया है शेर। एक दिन मैंने उससे कहा, ‘‘ कुछ समाचार सुनाओ।’’ उसने कहा, ‘‘कैसा समाचार? दादा, इन लोगों के कारण आप व्यर्थ मरे और अब भी आपको उनका मोह नहीं छूटता? ओह, कैसे लोग और कैसा लोकहित? देखो, आप पकड़े गए। बाकी सारे बुरकों में छिप गए। किसी ने चूं तक की हो तो शपथ! कैसा समाचार! अरे, आप मरे दुनिया डूबी।’’

अर्क हैं अर्क

हाल ही में इंग्लैंड में राज्यारोहण समारोह हुआ तो बंदियों में यह अफवाह उड़ गई थी कि इस अवसर पर छूट मिलेगी। वह हवलदार मेरे साथ बात करके गया ही था, इतने में एक और अधिकारी, जो मुझे कभी-कभी कुछ समाचार देता था, आ गया। उसे पत्र पढ़ने में रूचि नहीं थी। परंतु मुझे समाचार देने थे, इसलिए वह थोड़े पत्र छांट रहा था। उसने जल्दी से आते हुए कहा, ‘‘ मद्रास में अशे नाम के एक कलेक्टर को- एक शाक्त


70 of 1280

लेकर अब आएगी, तब आएगी, ऐसी राह देखते देखते निराश और भयभीत हो गए थे तथा वियोग की वेदना से फड़फड़ाते हुए आक्रोश कर रहे थे।

हाय! हाय! मेरे बिछोह की वेदनाओं का यथासंभव जितना चित्रण हो सके


उतना करूण, दारूण बनाने के लिए ही किसी दुश्ट चितेरे ने जान-बुझकर कबूतर के बच्चों के श्शोक की इस पृश्ठीाूमि का चयन किया है? यह तनाव मन के लिए असह्म था। भूमि पर लेटे लेटे ही आंख लग गई। इतने में-

’’उठिए, अरे सो रहे हैं क्या! साहब!, काम


70 of 2123