में दरबार है (यह उस समय की बात है जब जाॅर्ज पंचम गद्दी पर बैठनेवाले थे) तब छूटेंगे? ‘मैं कहता, न-न, भई, हमारे लिए जुबली कैसी? तथापि कभी दस-बारह वर्षों में समय बदला तो बदला। ’ तो वह अत्यंत कड़वा मुंह बनाकर कहता,‘ छिह, तुम्हें वे क्योंकर छोडे़गे, आपकों यों ही सड़ने देंगे, मरने के पश्चात् ही छोड़ेंगे’।
कांटों का मुकुट
मैं पुनः-पुनः मन-ही-मन ‘प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः’¹ - यह योगसूत्र बोलते हुए अपने मन को सिखाता िकइस कारावास में तुम्हें मानसिक यातना भी उसी तरह सहनी होगी जैसे शारीरिक यातनाएं। इससे यदि तुम्हारा तेजाभंग होता है तो यह माना जाएगा कि तुम्हारा तेज एक क्षणिक उत्तोजना ही थी। तुम ऐसा क्यों नहीं सोचते कि उन्हें इस खेल में आनंद आ रहा है? तुम्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है न कि इस खेल के नायक तुम हो? केवल इस तरह की वृत्तिा को मार लो। तुम तो
परमात्मने! प्र्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमोस्तु ते।।’-इस मंत्र का जाप नियमपूर्वक अवश्य करें।’’ उनकी ओर प्रशंसापूर्ण दृश्टि से देखकर मैंने उत्तर दिया, ’’अवश्यं’’
वे वापस लौट गए। मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। उन लोगों को, जो वापस लौट रहे थे, यह दिखाने के लिए कि मुझे ये श्रंखलाएं कतई भारी नहीं लगतीं, चलते समय मैं हेतुपूर्वक उन्हें खनकाते हुए जेल के भीतर लौट आया। परंतु मेरा मन? अभी-अभी मैंने उन्हें जिन शब्दों का उपदेश दिया था, उन्हीं का मन-ही-मन जोर से