यह घोर कर्म हमारे दादा कर ही नहीं सकते। लगता है, कुछ बड़े-बडे़ नामवर लोगों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए हमारे इस भोले शंकर को आगे करके सब्जबाग दिखाकर इन्हें मुंह के बल गिरा दिया। दादा, आपकी अपेक्षा मैं
कितना सुखी हूं। महीने-के-महीने वेतन पाता हूं, तिस पर पेंशन है ही। पचास-साठ रूपये खनखनाते हुए मजे में जीवनयापन कर रहा हूं। और आप- कुंदन जैसा दमकता रूप, खिलता यौवन, बालिस्टरी, दीवान की बेटी ब्याही हुई सर्वनाश किया आपने अपने जीवन का, स्वर्गीय सुख का । किसलिए? देश के लिए? दीवानगी है दीवानगी राव!’ मैं यह सब शांति से सुन लेता, परंतु कभी-कभी वह मेरे धैर्य का बांध भी तोड़ डालता। हाथ जोड़कर मुझसे कहता, ’महाशय, बताइए, सच-सच बोलिए-शासन की बागडोर आप कैसे हथियाएंगे? आपको क्या लगता है, कितने दिनों में आप छूटेंगे? इस दिसंबर
’’हम इस तरह का ही प्रयास कर रहे हैं। हम एक-दूसरे के लिए हैं ही। हमारी चिंता न करें, आप स्वयं का जतन करें, हमें सब कुुछ मिल जायेगा।’’ इस तरह हमारे प्रश्नोत्तर का अनुक्रम चल ही रहा था कि सुपरिटेंडेंट ने ’समय समाप्त होने’ का संकेत किया। अतः मैंने होंठों पर आए श्शब्दों को आधा-अधुरा ही छोड़कर इस भेंट को समाप्त किया। परंतु जाते-जाते साले साहब ने जल्दी-जल्दी कहा, ’’अच्छा, परंतुु एक नियम का अवश्य पालन करें। प्रतिदिन प्रातःकाल ’कृश्णाय वासुदेवाय हरये