हंसे तो मुसीबत। कब क्या दंड दिलवा दे। उनके हंसने पर वह और छाती फुलाकर कहता, अरे, हंसते क्यों हो? क्या हवा को मारने का यह साहस हमारे इन महाराज के साहस से अधिक हास्यास्पद है, जो आठ-दस लड़के लेकर अंगे्रज सरकार को मारने चले हैं?

विलायती छैल-छबीली

कभी हम स्नान करते तो वह वहीं खड़े होकर हमारी ओर घूरता रहता और अपने मातहत सिपाहियों से कहता, ‘गोंद्या, तनिक देखो तो हमारे दादा की देह! जैसे सोने का टुकड़ा। भुजाओं का गठाव, यह चैड़ी छाती! दादा कुश्ती करते थे, यह पक्का है। ‘फिर झट से आवाज पलटकर अति विन्रम स्वर में कहता, ‘अजी विलायत में ही रहकर किसी छैल-छबीली के रंग में रंगकर अपना यौवन बिता देते! क्हां यह आपका तारूण्य और उस पर कैसी मुसीबत! भला आपको ये लोहे की बेड़िया पहनने की हौंस क्यों लगी?

कभी वह कहता,‘ न-न!


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परंतु उसके योग से भविश्य में हजारों लोगों के घरों से कदाचित् सोने का धुआं भी निकल सकता है। उस पर ’घर-घर’ की रट लगाकर भी प्लेग के कारण क्या सैकड़ों लोगों के घर-बार उजड़ नहीं गए? विवाह-मंडप से दूल्हा-दूल्हन को कराल काल के गाल में खदेड़कर संकटों का सामना करो। मैंने सुना है, कुछ वर्शों के पश्चात् अंदमान में परिवार ले जाने की अनुमति दी जाती है। यदि ऐसा हुआ तो ठीक ही है, परंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो भी इस धैर्य के साथ रहने का प्रयास करो कि कुछ भी हो, इस समय को सहना ही होगा।’’


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