अधिकारी जानते थे, यद्यपि इसमें संदिग्धता थी कि पुनः उसकी भेंट होगी या नहीं, तथापि इतने निकट एक भीत की आड़ रहते हुए भी उन्होंने उससे मेरी भंेट नहीं होने दी। उसके पश्चात् वर्षों मुझे उसका कुछ भी समाचार नहीं मिला, यूं कहिए कि समाचार मिलने नहीं दिया गया कि वह कहां गया, कब छूटा, क्या करता है।
सिंह-पुरूष
ठाणंे कारागृह के सिपाहियों के अधिकारियों में से एक प्रमुख अधिकारी हेतुपूर्वक उजाड़ रखे गए मेरे भाग पर नियुक्त किया गया था। वह थुलथुल, गोलमटोल, हंसोड़ परंतु बड़ा ही घुन्ना था। गोरे अधिकारियों का बेहद विश्वस्त। वह यथासंभव मुझसे बात करने का प्रयास करता। मेरे विचार से मेरे लिए उसके मन में सम्मिश्र भावना थी, भले ही वह सत्य थी या मिथ्या। मेरे प्रति वह दया भाव प्रदर्शित करता था। भोजन यथासंभव ठीक-ठीक देने का प्रयास करते देखकर भी अनदेखी कर लेता, परंतु
आकाश आंधी-पानी से भर जाए, ऐेसे विचार अचानक एक ही क्षण में ह्नदय की विवेक चैकी पर उन्हें रोका गया। उनके सारे झंुड छिन्न-विछिन्न किए गए और दृश्टि मिलते ही नीचे बैठकर मुस्कुराते हुए मैंने पूछा,’’ क्यों, देखते ही पहचान लिया मुझे? यह तो केवल वस्त्र परिवर्तन हुआ है। मैं तो वही हूं। सर्दी का निवारण करना ही वस्त्रों का प्रमुख उद्देश्य होता है, जो इन कपड़ोें द्वारा भी पूरा हो रहा है।’’ थोड़ी देर में विनोद-निमग्न होकर वे दोनों इतने सहज होकर वार्त्तालाप करने लगे, जैसे वे