निकल भी गए। दादा, मैं शूर पुरूष हूं, और इसीलिए आप जैसे साहसी, पराक्रमी पुरूष का मैं बंदा हूं। भला मेरा कैसा साहस! म्ेरी मुक्ति होने में दो महीने शेष हैं। साहस तो आपका है कि ऐसे प्रसंग में भी आप इतने प्रसन्न हैं।’’
पत्र पहुंचा दिया
उसने जाकर विश्वासपूर्वक बाल को पत्र पहुंचाया। परंतु उसकी शूरता की व्याख्या मेरे ध्यान से नहीं उतरी। डाकू लोग चोरी को पाप और तुच्छ कर्म समझते हैं। मांग जाति के लोग डोमों को नहीं छूते! इसी तरह यह भी। दूसरे दिन मैंने उसे अन्योक्ति द्वारा सूचित करने का प्रयास किया-माना कि स्वार्थ हेतू लूटमार एक प्रकार से वीरता है तथापि वह श्रेयस्कर अथवा प्रशंसनीय नहीं है। वह भी समझ गया और आगे फिर कभी उसने डींग हांककर डाका डालने का उल्लेख नहीं किया।
मेरे आने के पश्चात् एक-दो दिन के अंदर की बाल को ठाणे से स्ािानांतरित करके कहीं अन्यत्र भेजा गया।
मुझे इस तरह निस्सहाय, निराशा की बेड़ियांे में जकड़ा हुआ देखकर उन्नीस-बीस वर्शीय उस बेचारी युवा रमणी के ह्नदय को कितनी ठेस पहुंची होगी? दोनों सलाखों के पीछे खड़े थे। मुझे छूने के लिए भी उनपर प्रतिबंध लगाया गया था। पास ही पराए लोगों का कड़ा पहरा! म्न में ऐसे भाव उमड़ रहे हैं, जिनको श्शब्दों का सान्निध्य भी संकोचास्पद होता है। हाय! पचास वर्शों के अर्थात् आजीवन बिछोह के पूर्व विदा लेनी है और वह भी इन विदेशी निर्दयी काराधिकारियों के स्नेहशून्य दृश्टिपातों की कक्षा में। इस जन्म में अब आपकी-हमारी भेंट लगभग असंभव ही है। ऐसा कहनेवाली वह भेंट!