करूंगा। परंतु यह एक आजन्म कारावास भुगतने के पश्चात् भी यदि मुझे छोड़ा नहीं गया तो केवल ं ं ं ं छूटेंगे या ं ं ं ंयों ही मरंेगे, यही मेरा निश्चय है। तुम चिंता मत करना अथवा इस विचार से अपना मन छोटा मत करना कि जीवन विष हो गया । वाष्पयंत्र को सक्रिय करने के लिए अपनी देह को ईंधन बनाकर यदि किसी को जलते-सुलगते रहना ही है तो भला वह हम ही क्यों न हों? इस तरह मात्र जलते रहना भी एक कर्म ही है । इतना ही नहीं, अपितु महत्कर्म है।’¹ ं ं ं ंवाॅर्डर ने संकेत रूप में खांसकर सूचित किया, ‘जल्दी करो’। मैं पाटी को द्वार के निकट रख पीछे हट गया। जाते-जाते उससे कहा, ‘‘मैं चाहता हूं, मेरे कारण आपको जरा सा भी कष्ट न पहुुंचे। आप चाहें और यदि आपको यह कर्तव्य लगता हो तो ही ऐसा साहस करें। हमने भरे गांव में प्रवेश करके सरे बाज़ार डाका डाला है और लड़ते-लड़ते
खड़े हैं- साथ में मेरी धर्मपत्नी2 । बंदीगृह के वेश में, कैदी के दुःखद स्वरूप में, पैरों में जकड़कर ठोंकी हुई भारी बेड़ियों को यथासंभव सहज उठाए हुए मैं आज पहली बार उनके सामने खड़ा हो गया। मेरे मन में धुकधकी हो रही थी। चार वर्ष पूर्व जब इसी बंबई से मैं इनसे विदा लेकर विलायत चला गया, उनकी आकांक्षा थी कि वापस लौटते समय मैं बैरिस्टरी के रोबदार गाउन (चोगा) में तथा उन भाग्यशाली लक्ष्मीधरों के मंडल से घिरा आशा एवं ऐश्वर्य की प्रभा से दमक रहा हूंगा। लेकिन आज