छूटेंगे या मरेंगे

तथापि शंका हुई,‘लिखवाकर इस पाटी को कहीं यह बाल के हाथ न सौंपकर अधिकारियों को न सौंप दे? मेरा जीवन गुप्तचरों से दंाव-पेंच खेलते हुए व्यतीत हुआ था। अतः मैंने किसी का भी नाम, गांव, अता-पता कोई विशेष कार्यøम न लिखते हुए अंदमान के अंधेरे फलक पर आशाओं की दो-तीन तूलिकाएं मारते हुए लिखा कि ‘यदि वहां के नियमानुसार मुझे अपना परिवार पांच-दस वर्षो के लिए ले जाने की अनुमति दी गई तो मैं अपनी जीवन साधना में व्यतीत करूंगा और यदि मैं पुनः हिंदुस्थान की पावन धरती के तट पर अपना पैर नहीं रख सका, तो ततः प्राचेतसः शिष्यौं रामायणमितस्ततः मैथिलेयौ कुशलवौ जगतुर्गुरूचोदितौ की तरह ही, उन अभिनव कुमारों


के कंठांे से देश भर में प्रचार करूंगा। एक जीवन की सफलता के लिए बस यही एक कार्य समर्थ है। इस योजना के अनुसार मैं अंदमान में पच्चीस वर्ष व्यतीत


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रस्से की आवाज उससे बंधे हुए चैपाये के मन में पल भर के लिए ही क्यों न हो, भरपूर चपलता भर देती है। मैं उठा। साहब किसलिए बुलाते हैं, यह पूछने का मन हुआ परंतु जब तक कोई कुछ न कहे तब तक किसी भी अधिकारी से स्वयं कुछ भी पूछना नहीं चाहिए, ऐसी प्रथा होने के कारण मैं कुछ बोला नहीं। पर वह सुशील हवलदार ही धीरे से बोला,’लगता है, कोई मिलनी आई है।’’

पत्नी से भेंट

कार्यालय में आते ही मैंने देखा, सलाखों की खिड़की के पास मेरे बड़े साले साहब1


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