भी नहीं मिलती। अतः हो सकता है, बाल को पत्र लिखने का यह अंतिम अवसर ही हो। मैंने उस वाॅर्डर को संकेत किया। वह दबे कदम आ गया। परंतु यह कहते हुए कि रात में देखा जाएगा, वह चलता बना। आधी नींद पूरी हो चुकी होगी। दरवाजे के सीखचों के पास धीमी खड़खड़ाहट सुनाई दी। मेरे कान खड़े हो गए, मैं चैंकते हुए उठ गया। देखा तो वाॅर्डर दरवाजा खड़खड़ा रहा था। उसने हाथ से संकेत किया ‘लिखिए’ और लालटेन समीप ले आया। मुझसे एक शब्द भी बोलते हुए यदि वह पकड़ा जाता तो उसे दंड हुए बिना नहीं रहता। दुष्टों में दुष्ट समझे जानेवाले इस घातक डाकू के मन में भी मेरे लिए इतनी सहानुभूति है, यह देखकर मैं दंग था। यही अनुभव आगे चलकर मुझे बार-बार हुआ। मैं उसका आभार प्रदर्शित करने लगा, परंतु जल्दी-जल्दी में उसने कहा, ‘‘दादा, तुरंत से पहले लिखकर दो।’’
हुआ था। उसकी ओर देखते हुए मैं कठिन समय काट रहा था। इतने में द्वार खटका। असमय द्वार खटका था-स्पश्ट है, अपने बंदी बने भाग्य में कुछ नई बात लिखी जानेवाली है। जिज्ञासावश मैंने ऊपर देखा, तो हवलदार ने कहा, ’’चलो, साहब बलाते हैं!’’ चाहे किसी बहाने भी क्यों न हो परंतु इस एकांत कोठरी से बाहर निकलने के लिए किसी भी कैदी का मन इतना तत्पर होता है कि ’चलो’ शब्द कान में पड़ते ही बंदी के मन में वैसा ही उत्साह
भर देता है जैसा तड़ाक् से टूटते हुए