कथन में आत्म-श्लाघा की जो गंध अनिवार्य रूप में आ जाती है, वह हमारे मन को पुनः-पुनः सकुचाया करती थी और प्रियजनों के पास अपने सुख-दुःखों को खुले मन से कह से कह डालने की प्रवृत्तिा गत तथा जिस संकटों के पराभव की कहानी बतलाने का आनंद अनुभव करने के लिए अत्यंत उत्सुक होने पर भी परिस्थिति पुनः-पुनः मार्ग अवरूद्व कर देती थी।
तथापि, जो कुछ भी आधा-अधूरा अथवा अल्प-स्वल्प सद्यःकालीन परिस्थिति की परिधि में बतलाने लायक होगा, उसे तो आपको कह देना ही होगा, हमें वह भी सुनने लायक लगने वाला है, इस प्रकार का अत्यंत उत्सुक, निश्पाप तथा प्रेमयुक्त आग्रह विख्यात प्रकाशन मंडलियों से लेकर पाठशाला के बच्चों तक, सभी ओर से हमें अभी भी लगातार होते रहते हैं। इस कारण ऐसे आग्रह का अब सम्मान न करना एक तरफ से विनय का अतिरेक करके सार्वजनिक मनो भंग करना होगा, ऐसा हमें
मध्य मेरा दुःख भी अभिव्यक्ति का सांस क्यों न छोड़े? इस अनंत अंतराल में मेरे भी आक्रोश के लिए स्ािान होगा। ऐसा सोचकर प्रवत्तिा कभी-कभी दुःख को एकबारगी निगलने के लिए तैयार हो जाती थी, परंतु तभी परिस्थिति उसके पांव खींचकर उसे पीछे ढकेल देती थी।
हमारी सद्ययःकालीन परिस्थिति में, हमारे अंदमानवाले अनुभव में जो कुछ बतलाने लायक है, वही विशेश रूप में बताया नहीं जा सकता। परिस्थिति की परिधि में जो बताया जा सकता है, वह बिल्कुल ऊपरी सतह का, खोखला तथा अपेक्षाकृत श्रुद्र लगता