चले गए थे। आज मेरा भी चिरवियोग होगा। आज हमारा यह बालक सचमुच अनाथ हो जाएगा। जब उसके मन में यह दारूण सत्य उतरेगा कि मैं लगभग फिर कभी न दिखने के लिए ही अंदमान जाऊंगा, तब उसके कोमल मन की कैसी अवस्था होगी? और मुक्ति के पश्चात् वह कहां जाएगा? उसे कौन सहारा देगा? कौन उसकी शिक्षा पूरा कराएगा? यह नन्हा बालक जिस किसी द्वार पर पहुंचेगा, उसके द्वार उसी के सामने धड़ाधड़ बंद कर दिए जाएंगे। दुःखावेग में ये सारे विचार एक साथ तरंगित होकर पुनः डूब गए। उनमें कुछ विचार पुनः ह्नदय में उथल पुथल मचाते रहे।

दादा, यह लिजिए

वही वाॅर्डर फिर पास आया। काफी अंधेरा हो गया था।

‘‘दादा!’’

‘‘हां।’’


‘‘यह लिजिए।’’ कहते हुए उसने एक पाटी मेरे हाथ में दी और हिदायत दी कि सुपरिटेंडेंट साहब ने सभी वाॅर्डरों को यह आज्ञा दी है कि आपको


58 of 1280

क्या? हां, कहिए। स्तुति सुनने जैसा अपनी निंदा सुनना यद्यपि कार्यकर्ताओं को प्रिय नहीं होता, परंतु सुनना आवश्यक होता है।’’

’’उस समाचार-पत्र ने आपको दंड घोशित होने पर विशेश रूप से आनंद व्यक्त करते हुए लिखा है- ज्ीम तंेबंस ींे ंज संेज उमज ूपजी ीपे ंिजमण्ष् मैंने कहा, ’’बस, इतना ही? चलो, यह तो अच्छा ही हुआ। यूरोप में मुझे डंतजलत (शहीद) कहा गया- उन्होंने मुझे त्ंेबंस (अधम) कहा। इन दोनों में आत्यंतिक निंदा-स्तुति के अनायास ही परस्पर काट हो जाने से मेरा अपना मूलभूत मूल्य ज्यों-का-त्यों अबाधित ही रहा।’’


58 of 2123