थोड़ा चबाना, उस पर घूंट भर पानी पीना और उसके साथ गटक जाना- इस तरह रोटी खाई। जल्दी ही शाम हो गई। कोठरी बंद करके लोगों के जाते ही निढाल होकर मैं बिस्तर पर लुढ़क गया। अंधेरा छाने लगा। इतने में कहीं से ऐसे मनुष्य की आवाज आई जिसे स्वयं सुनकर लोग भयभीत हो जाएं। धीरे से देखा, दुष्टों में दुष्ट जो वाॅर्डर मेरे लिए नियुक्त किए गए थे, उनमें से एक बंदी वाॅर्डर मुझे हौले से संकेत कर द्वार के निकट बुला रहा है। मैं चला आया। इधर-उधर देखकर उस बंदी वाॅर्डर ने कहा, ‘‘महाराज, आपकी वीरता की ख्याति हमने सुनी है। ऐसे शूर पुरूष के चरणों का मैं दास हूं। आपके लिए मुझसे जो भी बन पड़े, वह सब करूंगा। अब मैं एक समाचार देता हूं। परंतु वह आपके पास से फूटना नहीं चाहिए अन्यथा मैं मारा जाऊंगा। आप वीर हैं, चुगली जैसा दुष्कर्म आप कदापि नहीं करेंगे, फिर भी


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सरीखे पत्र को भी उस परिस्थिति में यह लिखना पड़ा। परंतु उस समय अपना निरपराधत्व तथा शिश्टतव प्रस्थापित करने के लिए किसी भी राजनीतिक संस्था अथवा व्यक्ति के लिए सावरकर को घोर अपराधी कहना और उस नाम का अशिश्टता से एकवचनी (तू-तड़ाक) उपपदों से उल्लेख करना एक अमोघ साधन बन गया था। इंग्लैंड में एक अंग्रेज अधिकारी हमारा गौरवपूर्वक उल्लेख करे और इधर हिंदुस्थान में हमें ’तू-तड़ाक’ के बिना बडे़ साहसी समाचार-पत्र भी संबोधन न करें- इसमें उस समाचार-पत्र अथवा


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