कारागार अधीक्षक को सौंपा गया, जैसे कोई निर्जीव वस्तु हों। मोटर-रेल, पुन्ः स्टेशन । यह पता चला- यह ठाणे है और हमें वही के कारागृह में जाना है।


प्रकरण -3

ठाणे कारागृह

कारागृह में जहां-तहां गड़बड़। पचास वर्ष का दंड का, कालेपानी का एक बैरिस्टर बंदी! अधिकारियों का कड़ा आदेश कि कोई मेरी ओर आंख उठाकर भी न देखे। सारे वाॅर्डर और कैदियों को बाहर निकालकर एक भाग पूरा खाली करके रखा था। परंत उस कठोर आदेश के बावजूद बंदीगृह की जिज्ञासा बदाते हनंी बनी । उस कोठरी पर, जिसमें मुझे रखा गया था, दुष्ट-से-दुष्ट और क्रूरता में विख्यात मुस्लिम वाॅर्डर नियुक्त किये गए थे। पूरा कठोर एकांत। भोजन आ गया। एक कौर भी गले से उतरना असंभव प्रतीत हो रहा था। बाजरे की घटिया रोटी और जाने कौन सी बहुत खट्टी भाजी, जिसे मुंह में भी नहीं डाला गया। रोटी का टुकड़ा तोड़ना,


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तथा उनके अनगामियों के पथ से किसी प्रकार का संबंध तो दूर, रत्ती भर सहानुभूति भी नहीं है। ’केसरी’ के जिस टुकड़े में मैंने यह वृत्तांत पढ़ा था, उसी में केसरीवालों ने एक-दो टिप्पणीं लिखकर सर हेनरी साहब का बचाव करने का प्रयास किया था। ’केसरी’ के लेख में मेरा नामनिर्देश एकवचनी संबोधन से किया हुआ देखकर मुझे मन-ही-मन आश्चर्य हुआ। ’सर साहब, यह सावरकर कौन? काला या गोरा, यह भी नहीं जानते।’ ऐसा वाक्य सर हेनरी काॅटन के समर्थन में लिखा था। ’केसरी’


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