यह क्या? आज इतना शीध्र भोजन? कारागृह में भले ही जान चली जाए, परंतु पूर्व नियोजित कार्यøमानुसार ही चलना होता है। यहां पर सबके लिए इतना समयशील रहना होता है। भोजन के लिए, अन्न के लिए, मृत्यु आ जाए तो भी भोजन जल्दी नहीं आ सकता, यदि आवश्यक हो तो मृन्यु भोजन आने तक रूके। तो फिर भला आज यह असमय भोजन क्यों? अर्थात् कुछ-न-कुछ नया घटनेवाला है। मैंने पहरे पर खडे़ गोरे अधिकारी की ओर जिज्ञासा दृष्टि से देखा। उसने अपनी टोपी पीछे करने के बहाने अपने हाथ दूर तक पीछे ले जाकर देा बार हिलाए- अर्थात् हमें कहीं और पहुंचना है। भोजन हो गया। भित्तिा पर एक नुकीले कंकर से कुछ कविताएं घसीटकर लिखी थी- उन्हें जल्दी-जल्दी पढ़कर रगड़-रगड़कर साफ किया- जिससे किसी को उनका पता न चले। इतने में सिपाही ने ‘चलो’ कहते हुए द्वार खोला। गोरे साजेंट के अधीन हमें


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करेगा। सर हेनरी साहब के इस भाशण से ही संपूर्ण अंगे्रजी समाज बौखला गया। सावरकर के लिए सहानुभूति का प्रदर्शन! भले ही वह निंदागर्भित क्यों न हो, लेकिन थी तो सहानुभूति ही। किसी ने कहा, इस हेनरी काॅटन की ’सर’ के काॅटन श्शब्द के आधार पर सावरकर ने यह उत्कृश्ट व्यंग्य रचना की है- काॅटन माने कपास, सरकी माने बिनौला- अर्थात् काॅटन का बिनौला निकाल डालो। किसी ने कहा, उसकी पंेशन बंद करो। आखिर चाय की प्याली के इस तूफान के झोंके के साथ ही राश्ट्रीय सभा का सावरकर


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