जो अधिक-से-अधिक दंड समझा जाता है- ही निश्चित किया जाए। इस आवेदन-पत्र का आज उत्तर आ गया । यह निर्णय दिया गया था कि ‘आपका आजन्म कारावास एककालिक न करते हुए वह क्रमानुसार भोगना पडे़गा। यही निर्णय उचित है, अतः आपका दंड पचास वर्ष तथा मुक्ति का वर्ष 1960¹ ही रहेगा। ‘यह बताने के लिए जो एक अंगे्रज सज्जन आए थे, उन्होंने मेरे आवेदन-पत्र की परिभाषा का हेतुपूर्वक अवलंब करते हुए मुझसे विनोदमिश्रित स्वर में कहा,‘‘सावरकर साहब, आखिर सरकार ने यही निश्चित किया कि आपको इस जन्म की आजन्म कारावास की सजा काटने के बाद
अगले जन्म में भी आजन्म कारावास काटना होगा।’’ मैं भी हंसते हुए बोला, ‘‘तो फिर इसमें भी कम-से-कम एक समाधान की बात यह है कि सरकार ने हिंदुओं के पुनर्जन्म के सिद्वांत को स्वीकार कर लिया है और ईसाई धर्म के पुनरूत्ािान का सिद्वांत छोड़ दिया है।’’
की भित्तिा पर मेरी एक बड़ी सी तस्वीर लगाई गई थी। गोश्ठी के प्रधान अतिथि सर हेनरी काॅटन जैसे जाने माने सज्जन ने मेरी तस्वीर को संबोधित करते हुए साहस, देशभक्ति की अत्युत्कटता आादि कुछ गणों की प्रशंसा की थी और इसके लिए खेद भी व्यक्त किया था कि ऐसे गुणसंपन्न नवयुवक का जीवन मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में ही इस प्रकार नश्ट हो रहा है। उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की थी कि कम-से-कम हेग का उच्चतम न्यायलय मत-स्वतंत्रता के अधिकारों को न कुचलकर मुझे फ्रांस वापस भेजने का निर्णय