ली- दया आती। और वे वज्रनिश्चयी वीर- जिन्होंने मात्र सुनने के लिए भी दुस्सह यातनाएं झेलीं- पर ‘उफ’ तक नहीं किया, न ही मेरे विरूद्व एक शब्द कहा, और उन युवकों की सब यातनाओं का स्मरण होते ही मुझे इतना दुःख हुआ कि कुछ देर में मैं अपनी यातनाओं को ही भूल गया। पुनः सोचता, कहीं मैं पिछड़ तो नहीं गया? सबसे आगे रहकर सामने हो रहे कठोर-से कठोर आघातों को झेलने के लिए क्या मैं छाती तानकर आगे नहीं खड़ा रहा? तो फिर अब जो अटल, अपरिहार्य है, जो सबका कार्य भाग है, उसके भागी भी सभी होंगे। और जो भोगना पड़ा वह तो कुछ भी नहीं है, अभी तो ं ं ं ं।

मैंने पहले भी एक निवेदन किया था, जिसमें यह प्रार्थना की थी कि मुझे दिए गए दो आजीवन कारावासों का दंड एककालिक किया जाए। उस प्रार्थना के समर्थनार्थ जो कारण मैंने प्रस्तुत किए थे, उनमें से एक यह था कि दंडविज्ञान में


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कविताओं की आवृत्तिा के पश्चात् भोजन करना। भोजन से निपटकर जेल बंद होने के बाद सर्वत्र श्शांति छा जाने पर ध्यान धारणा का अभ्यास करना, उसके पश्चात् रात नौ बजे तक सो जाना। नींद बहुत गाढ़ी जा जाती। एकांत कोठरी में इस तरह का कार्यøम चलता। कभी कभी ’प्रवृत्तिाचिये राजबिंदीं। पुढां बोधचिये प्रतिपदीं। विवेक दृश्यांची मांदी सारीत’¹ - इस प्रकार विवेक दृश्यों के झुंड दूर करने का प्रयास करते हुए भी चिंता तथा उद्वेग अचानक धर दबोचते, जिससे दम घुटने लगता। ऐसा लगता, अपने


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