यदि ऐसा दिन इस जिंदगी के दौरान निकलकर नहीं आया, तो नहीं कहेंगें यदि उस वृत्तांत को जगत ने नहीं सुना तो उस वजह से उसका महत्व तो कम नहीं होगा अथवा उसकी तीव्रता कम नहीं होगी, अथवा इस विश्व की विराट् दिनचर्या में वह सब अनसुना रहने के कारण कोई बड़ी रूकावट आनेवाली है, ऐसा भी नहीं। ऐसी हमारी सोच थी।
चित्त की ऐसी दोलायमान अवस्था में आज तक अंदमान के हमारे संस्करण हमारे प्रिय बंधुओं को सुनाने का काम वैसा ही रह गया। हमारे बाद अंदमान आकर हमारे पहले जो मुक्त हुए थे, ऐसे कतिपय राजनीतिक बंदियों ने अपने-अपने अनुभवों को प्रसिद्व किया- ऐसा हमने देखा। अन्यत्र भी वर्ष अथवा छह महीनों के लिए जो कारागृह में बंद थे, ऐसे लोगों ने भी उनके अनुभवों तथा उनकी यातनाओं की कहानी को समयःसमय
पर प्रसिद्व किया और हमने उसे पढ़ लिया। परंतु ऐसे आत्म-स्मृति
हेलिना से पेरिस जिसे दिन लाया गया, उस दिन एक पूरा-का-पूरा राश्ट्र अपने ध्वजों को झुकाए, अपने हजारों वाद्यों से हजारों शोक -स्वर तथा विरह गीतों को गाते हुए दुःख और आक्रोश का जो प्रकटीकरण कर रहा था-उस आक्रोश तक, उस राश्ट्रीय स्ुूर्तिगान तक, जितना भी प्राणिसृश्टि का आक्रोश है, उतना सब अपने-अपने दुःख को सर्वज्ञात करने में मग्न होता है। आक्रोश दुःख का स्वभाव ही है, सो इस अनंत अंतराल में जो अनंत चीखें अपने-अपने दुःख का बोझ हलका करती हुई विचरण कर रही है, उनके