ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अध्ययन करते समय ज्यू लोगों के राष्ट्रीय कारावास की दुर्भाग्यपूण तथा असहाय अवस्था और उससे छुटकारा पाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयत्नों का वर्णन पढ़ रहा था ं ं ं परंतु ये लोग मुझे अंदमान क्यों नहीं भेजते? मैंने कुछ ऐसा सुना था कि दंड घोषित होने के पश्चात् यदि बंदी को कालेपानी नहीं भेजा गया तो दंड के वे छह महीने गिने नहीं जाते। इसके अतिरिक्त मैंने अंदमान रेग्यूलेटर में भी पढ़़ा था कि छह महीने कारावास भुगतने के बाद बंदी को बाहर द्वीप पर छोड़़ा जाता है और जिसे थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना आता है, उस कैदी को सौ-सौ लोगों की देखरेख और अन्य महत्तवपूर्ण कृषि कार्य सौंपे जाते है। यदि ऐसा हो तो कारागृह की इस कोठरी के जीवन से उधर का जीवन अत्यधिक सुसह्म होने की संभावना है। कम-से-कम सागर तट पर पल भर रूककर खुली हवा में सांस लेना तो संभव होगा-


48 of 1280

का हलाहल किसी अपयश का रूद्र सरीखा अवतार धारण कर पचा लिया। गोविंदसिंहजी का यही अपयश आज मेरे भयंकर दुःख तथा पराजय का मेरूदंडवत् आधार बनेगा। यही मेरी पीढ़ी के अपयश, दुःख और पराजय की गहरी नींव पर भावी पीढ़ियों के यशप्रासाद खड़े करेगा।

भावनाओं के मीनार पर आरूढ़ होकर मेरा मन सुदूर दृश्य देखने में तल्लीन हो रहा था-और मेरे हाथ नारियल की मोटी-मोटी जटाएं तोड़ने, कूटने में, उन्हें सुलझाने में व्यस्त थे। प्रतिदिन के लिए निश्चित दस-पंद्रह आर्या (मराठी


48 of 2123