बरतन मांजकर पुनः उस हाल ही में बंद हुए सलाखोंवाले द्वार के निकट खड़ा रहा। सांझ हो गई। वही संध्या, वही रात, वही तात्तिवक विचारों से मिली हुई तात्कालिक शांति ‘सप्तर्षि’ कविता¹ के उत्तरार्ध का विषय बन गई है। आज दो आवेदन-पत्र दिए थे। डोंगरी छोड़ते ही उधर जो थोड़ा सा दूध मिलता था वह भी बंद हो जाने से तथा भायखला में केवल ज्वार की रोटी खाने से पेट खराब हो जाता था, अतः यह मांग की थी कि पुनः दूध दिया जाए। मुझसे अपने घर की तथा सरकार की सारी-की-सारी पुस्तकंे छीन ली गई थी। मेरी दूसरी मांग यह थी कि उनमें से कोई एक पुस्तक पढ़ने के लिए मिले। इस आवेदन-पत्र का उत्तर मिल गया-दूध की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती, बाइबिल के विषय में सोचें।
आखिर कुछ दिनों बाद बाइबिल मिल गई। बहुत दिन से पुस्तक न होने के कारण हाथ में आते ही लगा कि पढ़ा जाए। बाइबिल खोली, तभी प्रहरी ने बताया-
दस से बीस कविताओं की रचना और पुराने हर संस्करण के साथ कंठस्थ करने का क्रम रखा जाए, तो एक या आधा लाख महाकाव्य की रचना करना संभव है। तो फिर शुभस्य श्शीघ्रम्- आज ही हो जाए श्रीगणेश। प्रथम श्री गुरूगोविन्दसिंह का चरित्र गान।
श्री गोविन्दसिंह का चरित्र
क्योंकि गोविंदसिंह हुतात्माओं के मुकुट मणि थे। महान् यश से मंडित महापुरूश राजप्रासादों के सुवर्ण कलशों जैसे तेजस्वी दिखते ही हैं। परंतु आज उनका चरित्र
बखानने में, उनके यशोगान करने से मुझे उतनी श्शांति नहीं मिल