भायखला कारागृह

डोंगरी की एंकात कोठरी से भायखला की एकांत कोठरी पर चढ़ते समय गहराते एकांत तथा उदासीनता की अगली सीढ़ी चढ़नी पड़ी। डोंगरी में आस-पास कोई मनुष्य नहीं रहता था, परंतु कम-से-कम दूर से कोलाहल तो सुनाई देता था। आस-पास मनुष्य ही नहीं बल्कि एक-दो पुस्तकें तथा वे वस्तुएं भी जिनका मैं अभ्यस्त था, शेष नहीं थी।

समान का भी एक तरह का संग-साथ होता है, जेसे परिचित जनों क वियोग से सबकुछ शून्यवत् लगने लगता है। कोठरी का निरीक्षण किया। ऐसा कुछ नहीं था जो देखने योग्य हो। चहलकदमी करने लगा। मन-ही-मन सोचने लगा, मेरे पकड़े जाने से हमारी क्रांतिकारी संस्था की क्या स्थिति होगी? अब आगे की योजना बनानी चाहिए।

सांयकालीन भोजन आ गया। मेरे मन में राजनीति के विचारों से जो खलबली मची थी- अन्य विषय मिलने से वह कुछ शांत हो गई। भोजन से निपटकर,


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हो गया। पच्चीस वर्शों के बजाय अकल्पित भयंकर दंड हुआऋ पचास वर्ष, तथापि वही कार्यøम निश्चित किया। इतना ही नहीं, यह देखकर कि अंगीकृत महान् ध्येय की सिद्वि के लिए ऐसी निस्सहाय एवं निराश अवस्था में भी इतना कुछ तो किया ही जा सकता है और अभी तो कुछ ऐसा करना संभव है, जिससे यह जीवन कृतार्थ हो सकता है, मन की उदासी कुछ कम हो गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि निश्क्रिय विफलता के भय का बोझ हलका हो गया। आतुर मन ने यह गणना भी कर ली कि प्रतिदिन कम-से-कम


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