गाड़ी बंद हो गई, इतनी कि बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दिख रहा था। न दिशा, न मार्ग-केवल खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी। गाड़ी रूक गई- एक ओर जेल के पास अपने आपको खड़ा पाया। भीतर सोलह संस्कार किए गए, जो एक नए बंदी के लिए किए जाते हैं। आखिर कोठरी में बंद हो जाने के बाद देखा तो मैं एक ऐसे कारागृह में बंद हो गया था जो डोंगरी के कारागृह से भी कठोर एंकांत तथा निर्जन स्थिति में है। हां, दूर एक बंदी वाॅर्डर दिख रहा है। थोड़ी देर में भोजन आ गया। द्वार खोलते-खोलते उस अंग्रेज सार्जेंट ने, जिसे मेरे लिए भारतीय हवलदार के बदले हेतुपूर्वक भेजा गया था-इधर-उधर देखकर (ळववक कंल कहते हुए) राम-राम किया। मैंने धीरे से पूछा, ‘‘कौन सी जेल है?’’ उसने साथ के भारतीय बंदी को पता न चले, इसलिए स्पेल करते हुए बताया-ठलबनससं (भायखला)।
प्रकरण -2
फिर तब तक यह एक कार्य तो कार्यान्वित करूं जब तक उससे महत्वपूर्ण कोई अन्य कार्य संभवनीयता की कक्षा में नहीं आ रहा। बस, तय हो गया पच्चीस वर्शों में एक महाकाव्य की रचना करना। यह देखकर कि यदि हेग का निर्णय विपरीत हो गया तो बंदीशाला में हाथों से कठोर परिश्रम करते-करते ही (ऐसा प्रतीत हो गया कि) अन्य किसी भी साधन के अभाव में यह एक कार्य तो संभव है। यह देखकर मन की कार्यपिपासा श्शांत हो गई सी लगी। छअपटाहट थम गई। हेग का निर्णय विपरीत सिद्व