का चयन किया है? यह तनाव मन के लिए असह्म था। भूमि पर लेटे लेटे ही आंख लग गई। इतने में-

’’उठिए, अरे सो रहे हैं क्या! साहब!, काम के समय आपको यदि साहब ने सोते हुए देख लिया तो वे हमें क्या कहंेगे।’’ दरवाजे की सलाखों पर अपना डंडा जोर-जोर से खड़काते हुए सिपाही बोला।

मैं उठ गया। पुनः वही तूमार- उसे कूटना-खोलना-वही पिश्टपेशण ं ं ं ं ं ं

दंड प्रारंभ हुए प्रायः एक महीना बीत गया था। मुझे अभी भी वही भोजन मिलता था जो कच्चे बंदी को दिया जाता है, अतः मुझे दूध भी मिलता था। मैं अभी अभी भोजन से निपटा ही था। इतने में हवलदार ने मुझे बाहर बुलाया और तभी सपरिटेंडेंट भी आया,’’ अपना बोरिया-बिस्तर उठा लो।’’ मैंने अपना बिस्तर उठाया। सोचा, यह क्या-कहीं अंदमान तो नहीं जा रहे हैं। द्वार के पास आया, वहां जेल की गाड़ी खड़ी थी। मैं। भीतर बैठ गया,


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पास न रखने दिया, तो भी एकाध काव्य की रचना संभव है। मन-ही-मन कविता रच, कंठस्थ कर अपने स्मृति-पत्र पर ही उसे लिखता गया तो इस पर तो कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता। वर्तमान की इस अत्यंत निर्दय साधनहीनता में भी यह कार्य करना तो संभव है ही। औरयदि इस तरह मैं एकाध काव्य रच सका तो इस बंदीवास से कभी मुक्त होने पर, और यदि मुक्ति नहीं भी मिली तो भी अपनी मातृभूमि के चरणों में यह एक नवोपहार अर्पण किया जा सकता है। इतना कार्य भी कम नहीं है।


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