किया-मन को डांट पिलाई और जिस तरह किसी बछड़े को खींचकर लाया जाता है, उसी तरह मन को खींचकर विवेक के खूंटे से बांध दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मेरी संपूर्ण शक्ति निचुड़ गई है। कोठरी में बंद करके हवलदार के जाते ही मै। निढाल होकर भूमि पर लेट गया। देखा तो ऊपर कबूतर के बच्चे अकेलेपन के दुःखित स्वर में आक्रोश व्यक्त कर रहे थे, तड़प्प रहे थे। उनकी मां सवेरे एक साहब की बंदूक का शिकार बन गई थी और बच्चे, हमेशा की तरह वह चोंच मे दाने लेकर अब आएगी, तब आएगी, ऐसी राह देखते देखते निराश और भयभीत हो गए थे तथा वियोग की वेदना से फड़फड़ाते हुए आक्रोश कर रहे थे।
हाय! हाय! मेरे बिछोह की वेदनाओं का यथासंभव जितना चित्रण हो सके
उतना करूण, दारूण बनाने के लिए ही किसी दुश्ट चितेरे ने जान-बुझकर कबूतर के बच्चों के श्शोक की इस पृश्ठीाूमि
लिखा जाए। क्या, किस तरह, इतना ही नहीं अपितुु मुझे इस बात का भी निश्चित ज्ञान नहीं था कि
महाकाव्य होता क्या है? पर लिखूंगा, यह निश्चिय था। उस छुटपन से आज तक यह इच्छा सालती रही थी। कर्मक्षेत्र के घमासान में यद्यपि यह मनीशा मन से ओझल हो चुकी थी तथापि कारागृह की एकांत कोठरी की इस श्शांत धूलि पर लेटते ही यह इच्छा पुनः दृश्टिगोचर होने लगी। इस कोठरी में कठोर परिश्रम करते हुए भी कम से कम रात्रि में अकेले पड़े रहने पर बत्ती न दी या कागज-पेंसिल का टुकड़ा