हमारे प्रश्नोत्तर का अनुक्रम चल ही रहा था कि सुपरिटेंडेंट ने ’समय समाप्त होने’ का संकेत किया। अतः मैंने होंठों पर आए श्शब्दों को आधा-अधुरा ही छोड़कर इस भेंट को समाप्त किया। परंतु जाते-जाते साले साहब ने जल्दी-जल्दी कहा, ’’अच्छा, परंतुु एक नियम का अवश्य पालन करें। प्रतिदिन प्रातःकाल ’कृश्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने! प्र्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमोस्तु ते।।’-इस मंत्र का जाप नियमपूर्वक अवश्य करें।’’ उनकी ओर प्रशंसापूर्ण दृश्टि से देखकर मैंने उत्तर दिया, ’’अवश्यं’’
वे वापस लौट गए। मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। उन लोगों को, जो वापस लौट रहे थे, यह दिखाने के लिए कि मुझे ये श्रंखलाएं कतई भारी नहीं लगतीं, चलते समय मैं हेतुपूर्वक उन्हें खनकाते हुए जेल के भीतर लौट आया। परंतु मेरा मन? अभी-अभी मैंने उन्हें जिन शब्दों का उपदेश दिया था, उन्हीं का मन-ही-मन जोर से उच्चारण
किया हुआ ज्ञान उस फलहीन वृक्ष अथवा जलाशय में जलसंग्रह की तरह ही व्यर्थ होगा, जिसके जल से हजारों तो क्या, एकाध प्यासे की तृश्णा का भी श्शमन नहीं होता, अथवा न ही अन्नोत्पादन से क्षुधा का श्शमन होता है। जिन्होंने महान् तथा उपयुक्त कार्य किये हैं, मेरे समान कारावास तो उनमें से किसी एक को भी नहीं भुगतना पड़ा। ऐसे इस कठोर साधनहीन बंदीवास में भला मैं कौन सा कार्य कर सकता हूं- यह विकट समस्या थी।
महाकाव्य
धुर बचपन से ही एक इच्छा थी कि मराठी में एक महाकाव्य2