भी भव्यतर अर्थ लेना हो तो मानव सदृश घरौंदा बसाने में हम भी कृतार्थ हो गए हैं। हमने अपना घरौंदा तोड़-फोड़ दिया, परंतु उसके योग से भविश्य में हजारों लोगों के घरों से कदाचित् सोने का धुआं भी निकल सकता है। उस पर ’घर-घर’ की रट लगाकर भी प्लेग के कारण क्या सैकड़ों लोगों के घर-बार उजड़ नहीं गए? विवाह-मंडप से दूल्हा-दूल्हन को कराल काल के गाल में खदेड़कर संकटों का सामना करो। मैंने सुना है, कुछ वर्शों के पश्चात् अंदमान में परिवार ले जाने की अनुमति दी जाती है। यदि ऐसा हुआ तो ठीक ही है, परंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो भी इस धैर्य के साथ रहने का प्रयास करो कि कुछ भी हो, इस समय को सहना ही होगा।’’
’’हम इस तरह का ही प्रयास कर रहे हैं। हम एक-दूसरे के लिए हैं ही। हमारी चिंता न करें, आप स्वयं का जतन करें, हमें सब कुुछ मिल जायेगा।’’ इस तरह
इंच टुकड़ा पास रखना भी मना था। फिर स्टेड सरीखे बंदी की तरह उन विशयों पर लेख लिखने का नाम ही नहीं लेना चाहिए, जिन्हें अखबारों में निरूपद्रवी समझा जाता था। उस कोठरी में, जिसमें मुझे रखा गया था, पंछी तक पर नहीं मार सकता था, फिर प्रचार की बात ही क्या करना् ! कागज का टुकड़ा रखना भी जहां अपराध समझा जाता हो, वहां लेखन! क्लम घिसना सर्वथा असंभव ही था, स्वयं ही पठन द्वारा ज्ञान-प्राप्ति और भूली-बिसरी एकाध पुस्तक कभी-कभार हाथ लग जाए तो मात्र पढ़कर संचित