छोड़े? इस अनंत अंतराल में मेरे भी आक्रोश के लिए स्ािान होगा। ऐसा सोचकर प्रवत्तिा कभी-कभी दुःख को एकबारगी निगलने के लिए तैयार हो जाती थी, परंतु तभी परिस्थिति उसके पांव खींचकर उसे पीछे ढकेल देती थी।
हमारी सद्ययःकालीन परिस्थिति में, हमारे अंदमानवाले अनुभव में जो कुछ बतलाने लायक है, वही विशेश रूप में बताया नहीं जा सकता। परिस्थिति की परिधि में जो बताया जा सकता है, वह बिल्कुल ऊपरी सतह का, खोखला तथा अपेक्षाकृत श्रुद्र लगता हुआ, कहने में कोई रूचि नहीं और जो कहने लायक लगता है, उसे परिस्थितियां कहने नहीं देती। ऐसी अवस्था में कुछ भी बताते हुए कथ्य का चित्र रंगहीन तथा सत्वहीन कर देने की अपेक्षा अभी कुछ भी ने बताएं। जब वह दिन आ जाएगा कि सारी गूढ़ आकांक्षाएं अभिव्यक्ति हो सकें, सारी मूक भावनाएं खुलेआम बातें कर सके, उस दिन जो कुछ कहना है, यथा प्रमाण कह देंगे।
और अभी भी इसी प्रकार के अथवा इससे भी भयानक आह्नान आ गिरनेवाले हैं। इस जीवन-कलह के नगाड़े के कोलाहल के बीच हम अपनी
इतनी सी हलगी क्यों बजाते रहें?
दुःख के गले में आक्रोश का ढोल तो कुदरत ने ही लटका दिया है, ताकि उसे बजाकर वह अपना यथासंभव मनोरंजन कर सके। बाज ने निशाना लगाते ही विवश हो उसकी चांेच के अंदर ही फंसा हुआ पंछी- सहायता की लेशमात्र आशा न होते हुए भी- जो स्वाभाविक चीख् निकालता है, उस चीख से लेकर, नेपोलियन का श्शव सेंट