अचानक एक ही क्षण में ह्नदय की विवेक चैकी पर उन्हें रोका गया। उनके सारे झंुड छिन्न-विछिन्न किए गए और दृश्टि मिलते ही नीचे बैठकर मुस्कुराते हुए मैंने पूछा,’’ क्यों, देखते ही पहचान लिया मुझे? यह तो केवल वस्त्र परिवर्तन हुआ है। मैं तो वही हूं। सर्दी का निवारण करना ही वस्त्रों का प्रमुख उद्देश्य होता है, जो इन कपड़ोें द्वारा भी पूरा हो रहा है।’’ थोड़ी देर में विनोद-निमग्न होकर वे दोनों इतने सहज होकर वार्त्तालाप करने लगे, जैसे वे अपने घर में बैठकर ही गपशप कर रहे हों। अवसर पाकर मैंने बीच में ही कहा, ’’ठीक है, ईश्वर की कृपा हुई तो पुनः भेंट होगी ही। इस बीच कभी इस सामान्य संसार का मोह होने लगे तो ऐसा विचार करना कि संतानोत्पत्तिा
करना, चार लकड़ी-तिनके जोड़कर घोंसला बनाना ही संसार कहलाता हो तो ऐसी गृहस्थी कौए-चिड़िया भी बनाते हैं। परंतु गृहस्थी चलाने का इससे
’हेग’ का निर्णय होने से पहले ही पच्चीस वर्ष कैसे निकालूंगा, इसका एक मनोमय चित्र बनाया था। उसमें जो माप निश्चित किया था अब वही दुगुना करना है। इन पच्चीस वर्शो में इस असहाय, निःसाधन तथा निरूत्साही विजन बंदीवास में भला ऐसा कौन सा कर्म किया जा सकता है, जिसके अर्पण द्वारा मातृभूमि का ऋण अल्प, स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हो, हलका हो और मानवजाति की कुछ विशेश
सेवा हो सके। राले से लेकर को, जिसने ’पिलग्रिम्स प्रोग्रेस’ लिखा-लेखन-सामग्री मिलती थी। मझे पेंसिल का आधा