लेकर विलायत चला गया, उनकी आकांक्षा थी कि वापस लौटते समय मैं बैरिस्टरी के रोबदार गाउन (चोगा) में तथा उन भाग्यशाली लक्ष्मीधरों के मंडल से घिरा आशा एवं ऐश्वर्य की प्रभा से दमक रहा हूंगा। लेकिन आज मुझे इस तरह निस्सहाय, निराशा की बेड़ियांे में जकड़ा हुआ देखकर उन्नीस-बीस वर्शीय उस बेचारी युवा रमणी के ह्नदय को कितनी ठेस पहुंची होगी? दोनों सलाखों के पीछे खड़े थे। मुझे छूने के लिए भी उनपर प्रतिबंध लगाया गया था। पास ही पराए लोगों का कड़ा पहरा! म्न में ऐसे भाव उमड़ रहे हैं, जिनको श्शब्दों का सान्निध्य भी संकोचास्पद होता है। हाय! पचास वर्शों के अर्थात् आजीवन बिछोह के पूर्व विदा लेनी है और वह भी इन विदेशी निर्दयी काराधिकारियों के स्नेहशून्य दृश्टिपातों की कक्षा में। इस जन्म में अब आपकी-हमारी भेंट लगभग असंभव ही है। ऐसा कहनेवाली वह भेंट!

आकाश आंधी-पानी से भर जाए, ऐेसे विचार


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पडे़गे। मार्सेलिसस में मैं फिर से तब पकड़ा गया2 जब सारा शिक्षित जगत् कह रहा था


कि मुझे फ्रांस को लौटा दिया जाएगा- ऐसा वे निश्चितता से कह रहे थे-फिर भी मैंने मान लिया था कि अधिकतर फांसी चढ़ना होगा। परंतु अंत में दोनों ही निराशओं को झुठलाकर एक तीसरी निराशा अचानक आ धमकी, जो एक प्रकार से इन दोनों से भी महाभयंकर थी- पचास वर्ष का दंड1। इस तरह की उदास एकांत कोठरी में अकेले जीवन गुजारना-अकेले एक-एक घंटा गिनते हुए जीवन बिताना! ठीक है-यही होगा।


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