भर देता है जैसा तड़ाक् से टूटते हुए रस्से की आवाज उससे बंधे हुए चैपाये के मन में पल भर के लिए ही क्यों न हो, भरपूर चपलता भर देती है। मैं उठा। साहब किसलिए बुलाते हैं, यह पूछने का मन हुआ परंतु जब तक कोई कुछ न कहे तब तक किसी भी अधिकारी से स्वयं कुछ भी पूछना नहीं चाहिए, ऐसी प्रथा होने के कारण मैं कुछ बोला नहीं। पर वह सुशील हवलदार ही धीरे से बोला,’लगता है, कोई मिलनी आई है।’’

पत्नी से भेंट

कार्यालय में आते ही मैंने देखा, सलाखों की खिड़की के पास मेरे बड़े साले साहब1 खड़े हैं- साथ में मेरी धर्मपत्नी2 । बंदीगृह के वेश में, कैदी के दुःखद स्वरूप में, पैरों में जकड़कर ठोंकी हुई भारी बेड़ियों को यथासंभव सहज उठाए हुए मैं आज पहली बार उनके सामने खड़ा हो गया। मेरे मन में धुकधकी हो रही थी। चार वर्ष पूर्व जब इसी बंबई से मैं इनसे विदा


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तो फिर अचानक टूटे निराशओं के इस पहाड़ के नीचे हमारा जिस पीढ़ी को प्रयासों के मृत सरोवर के विशाक्त प्रदेश से मार्ग का अतिक्रमण करना हो, उसे प्रतिकूलता रूपी लोहे के चने चबाकर उन्हें हजम करने का अभ्यास करना ही होगा।

दारूण आघात

परंतु जो प्रतिकूल है वही घटित होगा, यह मानकर चलने की थोड़ी आदत और श्शक्तिवाले मेरे मन पर एकाएक इतना भयंकर आघात हुुआ कि मूच्र्छा आ जाए। मैं जब लंदन में पकड़ा गया था1 तभी मैंने समझ लिया था कि अंदमान में पच्चीस साल गुजारने


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