इस नियम का मैं इतना अभ्यस्त हो चुका था कि कभी बीच में द्वार खुलने की प्रतीक्षा भी शेश नहीं रही।

प्रतीक्षा ही नहीं रहने से बंद द्वार देखकर वह अस्वस्थता जो पहले होती थी, बहुत कम होती जा रही थी। उस पर अचानक मुझे एक साधन मिल गया, जो आजकल काम करते समय प्रतीत होनेवाली उकताहट को दूर करता था। कोठरी की छत में एक दरार थी, उसमें एक कबूतर-परिवार ने खपरैल के नीचे अपना डेरा जमाया हुआ था। उसकी ओर देखते हुए मैं कठिन समय काट रहा था। इतने में द्वार खटका। असमय द्वार खटका था-स्पश्ट है, अपने बंदी बने भाग्य में कुछ नई बात लिखी जानेवाली है। जिज्ञासावश मैंने ऊपर देखा, तो हवलदार ने कहा, ’’चलो, साहब बलाते हैं!’’ चाहे किसी बहाने भी क्यों न हो परंतु इस एकांत कोठरी से बाहर निकलने के लिए किसी भी कैदी का मन इतना तत्पर होता है कि ’चलो’ शब्द कान में पड़ते ही बंदी के मन में वैसा ही उत्साह


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घटित होगा’, यह गृहीत कर उसका सामना करना चाहिए। उन्हें नियम से हलाहल पीना ही चाहिए। ऐसा दृढ़ निश्चय करके कि प्रतिकूल ही होगा और मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर उसका सामना करूंगा। यदि कदाचित् अनुकूल बात हुई तो उसमें इतनी भी हानि नहीं होगी, प्रत्युत अनुकूलता का वह आनंद द्विगुणित होता है। हां, यदि मन में यही आस, यही लालसा रही कि जो अनुकूल है वही होना चाहिए और कुछ प्रतिकूल हो जाए, इस असहाय पीढ़ी में जन्म लेनेवालों के जीवन में यही अधिक संभव है,


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