आपके टहलने के समय सामनेवाली चाल में खडे़ रहेंगे, तनिक आप उधर नजर डालें। परंतु कल बंबई के एक एंेग्लों-इंडियन पत्र ने हेग के विशय में निर्णय लिखते समय आपके लिए जहर उगला है।’’

’’वह क्या? हां, कहिए। स्तुति सुनने जैसा अपनी निंदा सुनना यद्यपि कार्यकर्ताओं को प्रिय नहीं होता, परंतु सुनना आवश्यक होता है।’’

’’उस समाचार-पत्र ने आपको दंड घोशित होने पर विशेश रूप से आनंद व्यक्त करते हुए लिखा है- ज्ीम तंेबंस ींे ंज संेज उमज ूपजी ीपे ंिजमण्ष् मैंने कहा, ’’बस, इतना ही? चलो, यह तो अच्छा ही हुआ। यूरोप में मुझे डंतजलत (शहीद) कहा गया- उन्होंने मुझे त्ंेबंस (अधम) कहा। इन दोनों में आत्यंतिक निंदा-स्तुति के अनायास ही परस्पर काट हो जाने से मेरा अपना मूलभूत मूल्य ज्यों-का-त्यों अबाधित ही रहा।’’

सुबह कोठरी का द्वारबंद हो जाता, वह पुनः दस बजे खुलता।


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स्वयं पर गिराए गए संकट रूपी पर्वत के नीचे पिसते जीवन में यदि कोई एक नियम अतिशय कटु परंतु हितसाधक सिद्व हुआ है, तो वह यह कि सदैव वही होगा जो प्रतिकूल हो। उसका डटकर सामना करने के लिए मानसिक तैयारी करना।

जिन जिन व्यक्तियों का जन्म अत्यंत विपरीत देश, काल और परिस्थिति में हुआ हो, फिर भी जो उससे भंयकर संघर्श कर, उसे पराजित कर, उसकी छाती पर खड़े होकर किसी नवयुग का, किसी महान् ध्येय का सुप्रभात देखना चाहते हों, उन्हें ’प्रतिकूल ही बहुधा


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